Monday, 6 June 2016

मेरा दागिस्तान- रसूल हमजातो : समीक्षक- महेश पुनेठा

कल सुबह वरिष्ठ आलोचक जीवन सिंह ने अपनी फेसबुक पोस्ट में लिखा- यदि किसी को लोक को उसके सही अर्थ में जानना है तो रसूल हमजातोव की मेरा दागिस्तान पुस्तक को तब तक पढ़ना चाहिए, जब तक उसका एक एक सूत्र समझ में नहीं आ जाए ।लोक और आधुनिक बोध के आपसी रिश्ते को जानने के लिए इससे बेहतरीन कृति शायद ही कोई और हो। उनकी पोस्ट पढ़ते ही विचार आया कि क्यों न आज सायंकालीन भ्रमण के दौरान रसूल हमजातोव की कविताओं का पाठ किया जाय। मेरे पास ‘मेरा दागिस्तान’ दोनों खंडों में उपलब्ध है। बहुत पहले युवा कवि केशव तिवारी ने मेरे प्रति अनुज भाव से संपृक्त होकर मुझे बांदा से भेजी थी। उनकी यह सर्वप्रिय पुस्तक रही है। हमारे परिचय के शुरूआती दिनों से ही जब भी लोक की बात आती वे अपनी बातचीत में रसूल हमजातोव का जिक्र अवश्य किया करते थे। पढने का सुझाव देते. एक दिन उन्होंने डाक से किताबें ही भेज दी. ऐसा स्नेह;कुछ कहना उसको कम करना होगा. यह कहने में मुझे कोई हिचकिचाहट नहीं है कि इस किताब से ही नहीं बल्कि रसूल हमजातोव के नाम से भी मेरा पहला परिचय केशव जी ने ही कराया।

 उसके बाद कविवर विजेंद्र और आलोचक जीवन सिंह के ‘कृति ओर’ में लिख लेखों में अक्सर रसूल और दागिस्तान के बारे में पढ़ता रहा। इस पुस्तक को पढ़ने के बाद में रसूल हमजातोव का मुरीद हो गया। मुझे लगता है जैसे यह किताब हमारे पहाड़ पर ही लिखी गई हो। मुझे उनके पहाड़ और अपने पहाड़ में बहुत अधिक समानता दिखाई देती है। अपनी धरती से प्यार करने का मतलब क्या होता है और अपनी धरती से प्रेम करते हुए सारी दुनिया को कैसे प्रेम किया जा सकता है, मैंने इस पुस्तक को पढ़ने के बाद ही अच्छी तरह जाना- समझा। मुझे रसूल का यह कथन जैसे कंठस्थ हो गया कि जो अपनी मां से प्रेम नहीं कर सकता वह दूसरे की मां का सम्मान भी नहीं कर सकता है। उनकी सबसे बड़ी विशेषता ही यह है कि वह अपनी मातृभूमि को प्रेम करते हुए सारी पृथ्वी से प्रेम करते हैं। वह विविधता का सम्मान करते हैं। उनका यह कथन इस बात का प्रमाण है-‘‘क्या यह सच नहीं है कि फूल जितने भी विविधतापूर्ण होंगे ,उनका उतना ही ज्यादा खूबसूरत गुलदस्ता बनेगा । आकाश में जितने ज्यादा तारे होंगे,वह उतना ही ज्यादा जगमगायेगा। इंद्रधनुष इसीलिए तो सुुंदर लगता है कि पृथ्वी के सभी रंगों को अपने में समेट लेता है।’’ कितनी बड़ी बात है। आज हमें अपने देश के संदर्भ में इसी विचार की सबसे अधिक आवश्यकता है। 

‘मेरा दागिस्तान’ में मातृभाषा से प्रेम, जीवन का अनुभव,लोगों के चित्र और चरित्र, गीतों की धुनें, इतिहास की समझ,न्याय भावना ,प्यार ,मातृभूमि का प्राकृतिक सौंदर्य ,अपने पिता की स्मृति ,अपनी जनता का अतीत और भविष्य अद्भुत है। इसका एक-एक शब्द गहरी रागात्मकता से भर देता है। कविता और कवि कर्म को लेकर भी इस पुस्तक में बहुत कुछ कहा गया है। वह लिखते हैं कि साहित्य के स्रोत हैं-मातृभूमि ,अपनी जनता,मातृभाषा। मगर हर सच्चे लेखक की चेतना अपनी जाति की सीमाओं से कहीं अधिक विस्तृत होती है। सारी मानवजाति ,समूची दुनिया की समस्यायें उसे बेचैन करती हैं,उसके दिल-दिमाग में जगह पाती हैं। इस पुस्तक को पढ़ते हुए पता चलता है कि स्थानीयता कैसे वैश्विकता को मजबूत करती है। अपनी मातृभूमि का होते हुए भी सारे विश्व का कैसे हुआ जा सकता है? इसका उत्तर हमें रसूल हमजातोव के लेखन से मिलता है। वह कितनी बड़ी बात कहते हैं जिससे हमें सीखने की जरूरत है-‘‘मैं अवार कवि हूं। मगर अपने दिल में केवल अवारिस्तान ,केवल दागिस्तान ,केवल सारे देश के लिए ही नहीं ,बल्कि सारी पृथ्वी के लिए नागरिक के उत्तरदायित्व को अनुभव करता हंू। 

यह बींसवी सदी है। इसमें सिर्फ ऐसे ही जिया जा सकता है।’’ मैं तो कहुंगा कि इक्कीसवीं सदी में जीने का यह तरीका और अधिक जरूरी हो गया है। साथ ही वह यह भी याद दिलाते हैं-‘‘सागर तक पहुुंच जानेवाली ,अपने सामने असीम नीला विस्तार देखने और उस महान नीलिमा में घुलमिल जाने वाली नदिया को ऊंचे पहाड़ों में उस चश्मे को नहीं भूल जाना चाहिए ,जिससे धरती पर उसका पथ आरम्भ हुआ । उस पथरीले ,संकरे ,उबड़-खाबड़ और टेढ़े-मेढ़े रास्ते को भी नहीं भूल जाना चाहिए ,जो उसे तय करना पड़ा।’’ उनकी स्पष्ट मान्यता है कि निश्चय ही हम कवि सारी दुनिया के लिए उत्तरदायी हैं ,मगर जिसे अपने पर्वतों से प्यार नहीं ,वह सारी पृथ्वी का प्रतिनिधित्व नहीं कर सकता। रसूल अपनी धरती, अपने लोगों से कटे साहित्यकारों को एक तरह से सचेत करते हुए कहते हैं कि साहित्य जब अपने बाप-दादों की खुराक छोड़कर पराये,बढ़िया विदेशी भोजनों के फेर में पड़ जाता है ,जब वह अपनी जनता की परम्पराओं और रीति-रिवाजों ,भाषा और मिजाज से नाता तोड़ लेता है,उसके साथ विश्वासघात करता है,तो वह बीमार हो जाता है,उसके दम निकलने लगता है और कोई भी दवाई उसे बचा नहीं पाती। वह कविता को बैठे-ठाले और समय व्यतीत करने वालों का शौक नहीं मानते हैं। कवि-कर्म कोई ऐसा कर्म नहीं है जिसे हम बंद कमरों में बैठकर पूरा कर सकते हों, उसके लिए कष्ट उठाने की जरूरत होती है।

 वह अपनी पुस्तक में एक जगह लिखते हैं-‘‘अगर कविता रचने के लिए कवि को खुद कष्ट उठाना पड़ा है तो हर शब्द और हर कामा भी उसे प्यारा होगा। अगर उसने राह चलते पराये विचार इकट्ठे किए हैं तो उनसे बढ़िया कविता नहीं बनेगी।’’ अबूझ और पहेलीनुमा कविता के बारे में उनका स्पष्ट मानना है-कुछ कविताओं को पढ़ते हुए भी यह समझ में नहीं आता कि उनमें कवित्व अधिक है या कोरी शब्द भरमार। काहिल कवि ही जो मेहनत करने से घबराते हैं ,ऐसी कविताएं रचते हैं। इस तरह जीवन,प्रकृति,कविता आदि तमाम विषयों के बारे में तमाम बातें ‘मेरा दागिस्तान’ में भरी पड़ी हैं। इसे पढ़ते हुए पाठक उसी दुनिया में महसूस करता है। 


रसूल की कविताएं इतनी सरस और जीवंत हैं कि हमारी जबान में चढ़ जाती हैं। कल जब हम उनकी कविताओं का पाठ और चर्चा कर रहे थे, हमारे साथी राजेश पंत उनकी बहुत सारी कविताएं सुना रहे थे। कोई कविता यूं ही किसी को कंठस्थ नहीं हो जाती, क्यों हो जाती हैं, यह तो उनकी कविताओं को पढ़ते हुए ही अच्छी तरह से समझा जा सकता है।
कल पिछले पांच-छः दिनों के बाद गिरीश भाई फिर हमारे साथ थे. बारिश के चलते हम शहर के बीचोबीच स्थित पार्क में ही बैठ गये। जहां हम रसूल हमजातोव की कविताओं के लोक में खोए हुए थे, वहीं दस-बारह साल के बच्चों से लेकर बीस-बाईस साल के युवाओं के समूह थे जो बीड़ी-सिगरेट और चरस के लोक में अपना आनंद तलाश रहे थे। जिस अंदाज में ये समूह वहां आकर सिगरेट-बीड़ी में चरस भर, सुट्टा लगा निकल रहे थे, हम उन्हें कनखियों से निरखने और अफसोस व्यक्त करने के अलावा कुछ नहीं कर पाए। जैसे-जैसे शाम ढलने को आ रही थी पार्क में बैठ, धुंए के छल्ले बना उड़ाने वाले समूहों की संख्या बढ़ती जा रही थी। शायद इसीलिए पार्क पर अंधेरा होने से पहले ताला जड़ दिया जाता हो, लेकिन यह ताला तो हम जैसों के लिए था, उन्होंने तो अपने लिए रास्ता तलाश लिया था। उन्हीं के दिखाए रास्ते हम भी रेलिंग फांदकर बाहर निकल पाए। हमें तो इस नई पीढ़ी ने रास्ता दिखा दिया लेकिन खुद‘रास्ता’ भटक चुकी है। काश! हम भी इन्हें कोई रास्ता दिखा पाते। कुछ सोचना होगा इस बारे में।
समीक्षक : महेश पुनेठा 

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